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छंद 48 / शृंगारलतिकासौरभ / द्विज

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दोहा
(संक्षिप्ततया नायक-वर्णन)

श्री राधा की कबहुँ हरि, जोवैं बन मैं बाट।
लखि राधै हरि संभ्रमै, बर-अंगन कौ ठाट॥

भावार्थ: कबहुँ (कभी-कभी) केशव वन में राधिका की बाट जोहते और कबहुँ (कभी-कभी) प्राणप्रिया राधिका के अंग-प्रत्यंग का ठाट देख संभ्रमित होते हैं।