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छंद 96 / शृंगारलतिकासौरभ / द्विज

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मनहरन घनाक्षरी
(प्रोषितपतिका नायिका-वर्णन)

घूँमि कैं चहूँघाँ धाइ आवैं जलधर-धार, तड़ित-पताके बाँके नभ मैं पसरिगे।
‘द्विजदेव’ कालिँदी समीपन के, नीपन के, पात-पात जुगनू-जमातनि तैं भरिगे॥
चातक, चकोर, मोर, दादुर-सुभट जोर, निज-निज दाँव ठाँव-ठाँवन मैं अरिगे।
बिन जदुराइ अब कीजै कहा माइ हाइ! पावस महीप के चहूँघाँ घेरे परिगे॥

भावार्थ: पावस का राज-चमू से रूपक है, जैसे सेना के आने पर आकाश धुंधुरित होता है वैसे ही बादल चारों ओर से उमड़ अँधेरा करते चले आते हैं। जैसे कमनैत निरंतर बाण छोड़ते हैं वैसे ही बलाहकों की निरंतर जलधारा बरसती है। जैसे सेना में स्थान स्थान पर स्वर्ण-पताका उड़ती है वैसे ही सेनारूपी बादलों के बीच में बिजली चमकती है और यमुना के तटस्थ कदंब-वृक्षों के पत्ते-पत्ते जुगनुओं से भरे हुए दिखाई देते हैं अर्थात् सायंकाल को सेनाओं में जैसे स्थान-स्थान पर हजारों दीवटें और पंशाखे दीपशिखा से दिखाई देते हैं। चातक (पपीहा), चकोर, दादुर, मयूरादि सुभटों ने उचित स्थानों पर आकर मोरचा सा लगा लिया है और चारों तरफ से घेरे डाल दिए, अब बिना यदुपति के हम अबलाएँ क्या कर सकती हैं तथा कौन हमारी सहायता कर सकता है!