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जब हम तुम मिले-4 / वेणु गोपाल

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हमारा मिलना
क्या कोई जादू है?

कि दीवारें वे ही और वैसी ही
रहती हैं--खाइयाँ भी बीच में
वे ही और वैसी ही।--और

फिर भी हम-तुम मिलते हैं
तो नहीं सोचते कतई
कि दीवारों और खाइयों
के बावजूद कैसे मिल लिए? समंदर

ज़र-ख़रीद गुलाम-सा
पैरों को धोने लगता है। सूरज
इशारों पर
उगता है-- डूबता है। हम
एक-दूसरे के
और इस तरह पूरी दुनिया के
आलमपनाह की भूमिका में
वक़्त को
एक लम्बे घूँट में गटक जाते हैं-- लेकिन

फिर
थोड़ी ही देर बाद
बच रहते हैं--
खैयों और दीवारों के पार
रोते-सिसकते-झींकते-- दो अदना जीव।

तो वह क्या सब जादू होता है
जो हम-तुम मिलते हैं?
 

रचनाकाल : 3 अप्रैल 1977