भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सब जाने-पहचाने हैं / अशोक अंजुम

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 23:32, 24 मार्च 2025 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अशोक अंजुम |अनुवादक= |संग्रह=अशोक...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सब जाने-पहचाने हैं
खुद से हम अनजाने हैं

दिल टूटा तब ये जाना
कितने आप सयाने हैं

हर ठोकर बतलाएगी
हम कितने दीवाने हैं

मजनूं बोला मुसकाकर
मुझको पत्थर खाने हैं

चिड़ियाँ हैं बाज़ार ों में
जाल के नीचे दाने हैं

‘मैं’ से बोला ‘हम’ आखिर
रूठे सुजन मनाने हैं

पहले बहू के हिस्से थे
अब सासू को ताने हैं

घर-घर झूमे शाम ढले
गली-गली मयख़ाने हैं

कौन शहादत दे ‘अंजुम’
सब पर ख़ूब बहाने हैं