हमसफर की बेरुखी चुभती गई।
चाहतें मन की अधूरी रह गईं,
आस्था की लौ सदा जलती गई।
लोग अब मिलते कहाँ उस भाव से,
मेल की वह भावना घटती गई।
बेखबर थी और नहीं मैं बेजुबां,
ज़ुल्म अपनों का मगर सहती गई।
कब तलक खामोश रहते हम ‘मृदुल’,
बंद थी जो भी जुबां खुलती गई।