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होगा जो उस का वस्ल तो थल बैठियो रे जी
ये हिज्र के जो दिन हैं तो अब इन को झेल डाल
 
चढ़-मस्त है ददा कहीं उस की ये चुल बुझे
रंगीं ख़ुदा के वास्ते तू इस को खेल डाल
</poem>
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