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वह टूटा जी, जैसा तारा / माखनलाल चतुर्वेदी
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10:30, 7 अक्टूबर 2009
ले गुलाब-सौरभ आँचल में-
झोली भर-भर लगा लुटाने
सुर नभ से
उनरे
उतरे
गुण गाने,
उधर ऊग आये थे भू पर,
हरे राज-द्रोही दीवाने!
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