भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"आग में / सांवर दइया" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
पंक्ति 1: पंक्ति 1:
 
{{KKGlobal}}
 
{{KKGlobal}}
 
{{KKRachna
 
{{KKRachna
|रचनाकार=  साँवर दइया   
+
|रचनाकार=  सांवर दइया   
 
|संग्रह=
 
|संग्रह=
 
}}‎
 
}}‎

00:18, 8 जुलाई 2011 का अवतरण

आकाश में
गिद्धों की तरह तिर रहे हैं
हवाई जहाज़-हैलीकॉप्टर

आग में ओटी हुई बाटी
उथलना भूल जाती हैं
चूल्हे के पास बैठी हुई औरतें

धमाके.... धमाके.... धमाके...

अब बाटी उथलने से क्या होगा ?
अब तो
सब कुछ आग में ही है !

अनुवाद : मोहन आलोक