भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

चितराम : हे नागौरण : अेक / राजूराम बिजारणियां

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 10:35, 12 जून 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=राजूराम बिजारणियां |अनुवादक= |संग...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

‘‘हे नागौरण
नाड़ा तोड़ण
बळद मरावण
तूं क्यूं चाली आधै सावण!’’

मूंढै पसरी
बखत रै बिखै रो परमाण
बूढ़ी लकीरां...
खुंखावंती-खरणावंती
धूड़ उडावंती आंधी सूं
स्यात करै आ’ई सवाल!

सवाल आंधी रो नीं
सवाल...!
रेत रो, खेत रो
धोरै बूरयो धन अंवेरण रो।

धन...!
खेत रै मूंडै रमी रेत
रेत...!!
जिण रै रूं-रूं
पुरखां री देही रो पसेव
बंधावै धीज
देवै होसळौ

जिण पाण
घूमूं देही में
पाळतो प्रीत
परोटूं रीत।