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दोहा / भाग 3 / रत्नावली देवी

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असन बसन भूषन भवन, पिय बिनु कछु न सुहाय।
भार रूप जीवन भयो, छिन छिन जिय अकुलाय।।21।।

पति गति पति वित मींति पति, पति गुर सुर भरतार।
रतनावलि सरबस पतिहि, बंधु बंद्य जगसार।।22।।

पति के सुप सुष मानती, पति दुष देषि दुषाति।
रतनावलि धनि द्वैत तजि, तिय पिय रूप लषाति।।23।।

सब रस रस इक ब्रह्म रस, रतन कहत बुधि लोय।
पै तिय कहँ पिय प्रेम रस, बिंदु सरिस नहिं सोय।।24।।

पिय सांचो सिंगार तिय, सब झूठे सिंगार।
सब सिंगार रतनावली, इक पिय बिनु निस्सार।।25।।

नेह सील गुन वित रहित, कामी हूँ पति होय।
रतनावलि भल नारि हित, पूज्य देव सम होय।।26।।

अंध पंगु रोगी बधिर, सुतहि न त्यागति माय।
तिमि कुरूप दुरगुन पतिहि, रतन न सती बिहाय।।27।।

कूर कुटिल रोगी ऋनी, दरिद मंद मति नाह।
पाइ न मन अनषाइ तिय, सती करत निरबाह।।28।।

विपति कसौटी पै बिमल, जासु चरित दुति होइ।
जगत सराहन जोग तिय, रतनसती है सोइ।।29।।

सती बनत जीवन लगै, असती बनत न देर।
गिरत देर लागै कहा, चढ़िबो कठिन सुमेर।।30।।