भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

दो मुक्तक / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Kavita Kosh से
सम्यक (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:44, 26 जुलाई 2009 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं उजाला हूँ
मैं उजाला हूँ, उजाला ही रहूँगा,
अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा।
चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए,
पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा॥

उपहार
पल जो भी मिले हैं मुझे उपहार में,
उनको लुटा दूँगा मैं सिर्फ़ प्यार में।
नफ़रत की फ़सलें उगाई हैं जिसने,
मिलेगा उसे क्या अब इस संसार में॥