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पहाड़ की याद / गिरीश चंद्र तिबाडी 'गिर्दा'

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ओ हो रेऽऽऽऽ, आय हाय रेऽऽऽ,
ओ दिगौ लाली।
छानी-खरिक में धुंआ लगा है,
ओ हो रे, आय हाय रे,
ओ हो रेऽऽऽऽऽऽ, ओ दिगौ लाली।

ठंगुले की बाखली, किलै पंगुरै है,
द्वि-दां कै द्वि धार छूटी है।
और दुहने वाली का हिया भरा है,
ओ हो रेऽऽऽऽ आय हाय रेऽऽऽऽ
(देखिये! छाते से दूध बहने लगा है)
दुहने वाली का हिया भरा है,
ओ हो रे,
मन्दी धिनाली।

मुश्किल से आमा का चूल्हा जला है..
(चौमासा का दिन छन, झड़ पड़ रई, लाकड़ा-पातड़ा सब भिज रई)
मुश्किल से आमा का चूल्हा जला है,
गीली है लकड़ी, गीला धुंआ है,
साग क्या छौका कि पूरा गौं महका है,
ओ हो रे, आय हाय रेऽऽऽऽऽ
गन्ध निराली...।

कांसे की थाली सा चांद तका है,
ओ ईजाऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ ओ दिगौ लाली।
ओ हो रेऽऽऽऽऽ शाम निराली,
ओ हो रेऽऽऽऽऽऽऽऽ सांझ जून्याली।
जौयां मुरुली का शोर लगा है,
ओ हो रेऽऽऽऽऽ लागी कुत्क्याली।
ओ हो रेऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽओ दिगौ लाली...........!