Last modified on 23 अगस्त 2013, at 18:28

बापू / फ़रीद खान

Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 18:28, 23 अगस्त 2013 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=फ़रीद खान }} {{KKCatKavita}} <poem> बापू! मूर्ख म...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

बापू!
मूर्ख मुझे मुसलमान समझते हैं।
उससे भी ज्यादा मूर्ख खुश होते हैं कि
एक मुसलमान राम भजता है।
सच बताता हूँ तो मेरा मुँह ताकते हैं।

सीधी बात से वे चकरा जाते हैं।
टेढ़ी बात पर तरस खाने लगते हैं मुझ पर।

बापू!
मैं क्या करूँ अपने निर्दोष मित्रों का?