भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बैठ केॅ धुनऽ अप्पन कपार / कैलाश झा ‘किंकर’

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 00:29, 13 मई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=कैलाश झा ‘किंकर’ |अनुवादक= |संग्र...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बैठ केॅ धुनऽ अप्पन कपार

जै अफसर सें काम पड़ै छै
घूस बिना नै काम करै छै
देश-प्रेम के बात कहऽ तेॅ-
नै सुनै लेॅ कोय तैयार।

कौआ-मैना मौज उड़ाबै
हंस केॅ सभ्भैं तरसाबै
बात करऽ नै प्रजातंत्र के-
मूर्खऽ के होय छै सरकार।

दोषी छुट्टा सांढ़ घुमै छै
निर्दोषी सें जेल भरै छै
आँखऽ पर पट्टी देवी के-
न्याय बनल छै अब व्यापार

रक्षक भक्षक बनी केॅ घूमै
शत-शत रावण साँझ केॅ झूमै
विपदा के मारलऽ बेचारी-
बलात्कार के भेलै शिकार।

शाख-शाख पर उल्लू बसलै
बाग-बाग के फूल उजड़लै
अकुलाबै छै अंकुर-अंकुर-
महाप्रलय के छै आसार।