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याद में अपने यार-ए-जानी की / वाजिद अली शाह

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याद में अपने यार-ए-जानी की
हम ने मर मर के ज़िंदगानी की

दोस्तो को अदू किया हम ने
कर के तारीफ़ यार-ए-जानी की

क्यूँ न रुसवा करे ज़माने में
ये कहानी ग़म-ए-नहानी की

रूह होएगी हश्र में साहब
इक निशानी सरा-ए-फ़ानी की

ख़ाक-सारी से बढ़ गया इंसाँ
अर्ज़ पर सैर आसमानी की

ज़र्द सूरत पे हिज्र में न हँसो
शरह है रंग-ए-ज़ाफ़रानी की

आज कल लखनऊ में ऐ 'अख़्तर'
धूम है तेरी ख़ुश-बयानी की