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नव सुमंगल गीत गाएँ / अजय पाठक

6 bytes removed, 18:38, 15 सितम्बर 2009
रिश्मयों को आज फिर,
आकर अंधेरा छल न जाए,
आैर और सपनों का सवेरा, व्यथर् व्यर्थ् हो निकल न जाए।
हम अंधेरों का अमंगल,
दूर अंबर से हटाएं,
एक दीपक तुम जलाआेजलाओे,
एक दीपक हम जलाएं।
आंिधयां आधियां मुखिरत हुई है,
वेदना के हाथ गहकर,
आैर और होता है सबलतम,
वेग उनका साथ बहकर।
झिलमिलाती रिश्मयों की,
अस्िमता अस्मिता को फिर बचाएं,एक दीपक तुम जलाआेजलाओे,
एक दीपक हम जलाएं।
अब क्षितिज पर हम उगाएं,
स्वणर् स्वर्ण् से मंिडत मंडित सवेरा,आैर और धरती पर बसाएं, शांित शांति का सुखमय बसेरा।
हम कलह को भूल कर सब,
नव-सुमंगल गीत गाएं,
एक दीपक तुम जलाआेजलाओे,
एक दीपक हम जलाएं।
</poem>
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