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हलमान / पतझड़ / श्रीउमेश

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यै दिगार के हलमानों के डेरा छेलै हमरे डार।
दिन-भर चास उजारेॅ सबके, साँझें उतरी आबेॅ पार॥
एक तोलङ डां हुप्प-हुप्प करिकेॅ झकझोरेॅ करेॅ निनान।
ओकरा डरें डरैलोॅ काँऐॅ-तरकारी के दुखी किसान॥
नङ्ड़ी पकड़ी-पकड़ी केॅ झूलै छेलै बच्चा हलमान।
उछलै छैलै, कुदै छेलै, किलकै छेलै साँझ-बिहान॥
पतझड़ होला पर एक्को हलमान कथी लेॅ एतोॅ पास।
यै पतझड़ में ओकरो डेरा उजड़ी गेलै, होलोॅ उदास॥