भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

विनय 4 / शब्द प्रकाश / धरनीदास

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 05:28, 21 जुलाई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=धरनीदास |अनुवादक= |संग्रह=शब्द प्...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वाजिगर पूतरी को काह आपनो चलाव, जैसे ही फिरावे सो ते साइ नाच नाचिये।
कोइ ना करत धरु देखत अनेक नरु, दीनानाथ दया करु कैसे काल बाँचिये।
दवो तन मन प्रान सकल जहान जान, सोइ करे त्रान वात धरनि है साँचिये।
जेते सान मद माँह काहु को न साका रहो, दीनबन्धु! तेरे विनु और काहि याचिये॥17॥