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155 / हीर / वारिस शाह

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मही छड माही उठ जाए भुखा उहदे खाने दी खबर ना किसे कीती
भता फेर ना किसे ल्यावणा ए एदूं पिछली बाबला हो बीती
मसत होय बेहाल ते महर कमला जिवें किसे अबदाल[1] ने भंग पीती
किते एसनूं झब वयाह देईये एहो महर दे जीऊ दे विच सीती

शब्दार्थ
  1. मलंग, फकीर