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अनुभव किया जा सकता है तुमको / शलभ श्रीराम सिंह

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आती हो तुम अन्धेरे में प्रवेश करती है जैसे किरण
स्वर-तरंग सन्नाटे में प्रवेश करती है जैसे
सुख की अनभूति जैसे घोर दुख के भीतर

रहती हो तुम एकांत में स्मृति की तरह
गंध की तरह फूल के भीतर
आकांक्षा की तरह मन में

होती हो तुम दूब के भीतर जैसे हरियाली
लाली जैसे नौधा पत्तियों के भीतर
पानी के भीतर जैसे ठण्ड

लिखा नहीं जा सकता है तुमको अक्षरों में
शब्दों में बोला नहीं जा सकता है तुमको
तुमको जिया जा सकता है केवल
केवल अनुभव किया जा सकता है तुमको।


रचनाकाल : 1992 मसोढ़ा