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अपने तप्त करों में ले कर / अज्ञेय

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 अपने तप्त करों में ले कर तेरे दोनों हाथ-
मैं सोचा करती हूँ जाने कहाँ-कहाँ की बात!
तेरा तरल-मुकुर क्यों निष्प्रभ शिथिल पड़ा रहता है
जब मेरे स्तर-स्तर से ज्वाला का झरना बहता है?

क्यों, जब मैं ज्वाला में बत्ती-सी बढ़ती हूँ आगे-
अग्निशिखा-से तुम ऊपर ही ऊपर जाते भागे?
मैं सोचा करती हूँ जाने कहाँ-कहाँ की बात-
अपने तप्त करों में ले कर तेरे दोनों हाथ!

1935