भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

आधी रात में प्रेमिकाओं का विलाप / प्रणय प्रियंवद

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

रात सपने में मैं
गोधरा में था
साबरमती एक्सप्रेस में
सफर करता हुए
मैं हिन्दू था
खून का रंग लाल था मेरा भी
मुसलमानों की तरह
मेरे मुंह में भी बत्तीस दांत थे
जीभ थी
बंद और खुलनेवाले
होठ थे
हम नहीं जानते थे कि क्या होनेवाला है गोधरा में
वहां स्टेशन पर
मुझे खींचकर
काट डाला गया
मेरी जीभ नहीं काटी गई
दांत नहीं उखाड़े गए
न ही होठ क्षतिग्रस्त किए गए
हमें धड़ से अलग कर दिया गया

मित्र शहंशाह आलम से आजतक
कुरान की आयतें नहीं सीखीं
न वह जो अज़ान में पढ़ता है वह
हम दोनों के बीच कुरान या रामायण पर
कभी चर्ची नहीं हुई

गोधरा स्टेशन पर आज वह सब कुछ खल रहा था
शहंशाह आलम की तरह कुरान पढ़नेवाला
कोई आदमी ही था वह
जिसने मेरे अलावा कइयों के प्राण को शरीर से बेदखल कर दिया

सपने में मैं मरकर भी
जीवित था
प्रतिशोध में मै धधक रहा था
गुजरात के गांवों में घूम-घूम कर मैंने हत्याएं की
खून पीया भर नाक
और त्रिशूल की नोक
वहां खुली हवा में टहलने निकले शहंशाह के पेट में घुसेड़ दी

काश शहंशाह को हनुमान चालीसा की पंक्तियां याद होतीं तो
वह बच जाता
उसने कभी मुझसे पूछा भी नहीं
ऊंटनी के प्रेम पर
कविताई करने में वह लगा रहा

हम साहित्य और विचारधारा पर साप्ताहिक गोष्ठियां करते रहे
काशीनाथ सिंह के संस्मरण से होते रहे आह! वाह!
हमने कुरान और रामायण का
आदान-प्रदान नहीं किया
धर्म पर गोष्ठियां नहीं की
एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में जाते रहे
सेवइयां और पूए खाते रहे
हमने कभी साड़ी और बुर्के की ज़रूरत पर
बहस नहीं की
मैं बसन्त-गीत गाता रहा और वह कविता में
माउथ-आर्गन बजाता रहा
हमें नहीं मालूम था कि साबरमती एक्सप्रेस में हम इतने कमज़ोर साबित होंगे
हमारा पढ़ा काम नहीं आएगा
कविताएँ, गोष्ठियां, बहसें सब व्यर्थ जाएंगी एक रोज़
किसने सोचा था!
खून से लथपथ रात थी वहां
सपने लाल थे
कविताओं और नज़्मों की कराह थी जो साफ़ सुनी जा सकती थी
प्रेमिकाओं का विलाप पसरा हुआ था
प्रेम कविताएँ एक-एक कर गल रही थीं
कोयलों की कूक की जगह
चील-गिद्ध और सांप थे वहां
क्या पता था कि यह रात मनुष्यता की काली रातों को जन्म देगी
ह्त्या फिर हत्या और फिर
विरोध में हत्या का अनंत सिलसिला
रातभर चलता रहा



मैंने देखा
नियमानुसार रात धीरे-धीरे जा रही थी
आकाश साफ़ हो रहा था
हम बशीर बद्र और राजेश जोशी
की कविताओं पर फिर से
बात कर रहे थे

ईद की मुबारकबाद दे रहे थे
होली की शुभकामनाएं ले रहे थे
हम अवधेश प्रीत के कहानी संग्रह
नृशंस पर बतियाने बैठ रहे थे
खगेन्द्र ठाकुर से आने का आग्रह कर रहे थे।