भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

इसी प्रश्र पर / नवीन दवे मनावत

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अचानक
शहर में मुझे
धुआं दिखाई दिया
मैंने समझा
चूल्हा जला होगा
फिर सोचा
अरे! ये तो शहर है
कही
श्मसान में मुर्दे
तो नहीं जल रहे
पर तनिक विचार आया
मुर्दे तो अभी जिंदा है शहर में!
क्या आदमी से
आदमी जलता होगा
पर वह धुआं रहित
अग्नि है?
क्या
मंदिर आदि में
पूजा अनुष्ठान तो नहीं हो रहे?
या जल गई
किसी गरीब की
झोपडी
पर ये तो शहर है
बस
इसी प्रश्न पर मन अडा है?