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इस बार खिलाड़ी / ऋचा जैन

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ये नहीं कि हम हैं नहीं
ऐसे देखेंगे तुम्हें खेलते, जैसे देखते रहे हैं हमेशा से
तुम्हारे आँगन की क्यारियों में खिले फूल
मोहल्ले के नुक्कड़, कंकड़-पत्थर, धूल
टीलों के पेड़ और शहर के ताल
 
हम भी कुछ यूँ ही देखेंगे तुम्हें
इस बार खिलाड़ी
रात लपेट भेज देंगे तालियों की गड़गड़ाहट
उगते सूरज की ऊष्मा बिखराएगी, सोखना
सकूरा छिपाए है अनुराग हमारा
उसकी पत्तियों की नरमी छितराएगी
नारे तुम्हारे नाम के, सुनना
हम कुछ इस तरह बतियाएंगे तुमसे
इस बार खिलाड़ी

आँखें बंद करना और महसूसना
स्टेडियम के निर्वात से उठती असीम तरंगें
झंकृत करती तुम्हारी देह की प्रत्येक कोशिका को
रिक्त दीर्घाओं की ओर देखना बुद्ध की अर्ध मुस्कान धर
और पाना नि: शंक उर
हर अगली श्वास तक पहुँचना जैसे बढ़ता हुआ वलय
स्थापित करता अपना वर्चस्व

देखना मस्तिष्क की आँखों से तुम स्वयं पर टिकी हुई असंख्य आँखें
उसी के कानों से सुनना करोड़ों कंठों से ढोलों की थाप पर थिरकती गूँजें
मस्तिष्क के हृदय से ही होना स्पंदित, लयबद्ध अनंत धड़कनों के साथ

हम कुछ इस तरह रहेंगे मौजूद
इस बार खिलाड़ी
कभी न था इतना ज़रूरी, जितना अबके है ये खेल
दौड़ना उछलना उचकना तैरना भेदना
पकड़ लेना उन क्षणों को जो तुम्हारे हैं

अपने स्वेद की हर बूँद से भर देना
उत्कट जिजीविषा हर छाती में
हर ललाट में अदम्य आशा

खेलना कुछ इस तरह
इस बार खिलाड़ी