भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

उत्सवों का मौसम / राजकिशोर सिंह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मन वंशी के स्वर सा तन जाता है
जब-जब उत्सवों का मौसम आता है
तब पिफर से सजायी जाती है दुकान
होठों पे दिऽती है व्यापारिक मुस्कान

होली में पिचकारी रंग व गुलाल
और आ जाता है वस्त्रों का भूचाल
दिवाली में होती पटाऽों की भरमार
और केंडिलों से जगमगाता संसार

एक ऐसा मौसम भी आता त्योहार का
विज्ञापन से तन छुप जाता दीवार का
तब नए-नए स्कूलों का होता निर्माण
तब उसकी भी सजती ऽूब दुकान

बदनाम करते स्थापित स्कूलों को
अपफवाहों से भरमाते लोगों को
नीचता की सीमाएँ लाँघता इंसान
भगवान भी देऽकर होते हैरान।