भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

एक कविता खलील जिब्रान के लिए / मंजरी श्रीवास्तव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

खलील
ओ मेरे प्यारे खलील
सुन रहे हो मेरी आवाज तुम
या नहीं...
मैं सलमा हूँ
तुम्हारी सलमा
सलमा करामी
तुम्हारे प्यार ने दुबारा धरती पर आने को मजबूर कर दिया मुझे
उस बिशप ने मुझे तुम्हारी पत्नी न बनने दिया
यह एक तरह से अच्छा ही हुआ
नहीं तो तुम सिर्फ़ मेरे खलील ही रह जाते
खलील जिब्रान न बन पाते
मैं उस बिशप के भतीजे की पत्नी बनी जरूर
पर मेरे दिल में हमेशा तुम्हारी तस्वीर रही
जिब्रान बनकर तुमने कहा था --
"प्रेम जब भी तुम्हे पुकारे, उसके पीछे चल पड़ो,
यद्यपि उसके रास्ते बीहड़ और दुर्गम हैं ।"

और तुम्हारी इस अनंत पुकार पर
चल पड़ी मैं
प्रेम के बीहड़ और दुर्गम रास्ते पर
और आ पहुँची यहाँ तक
तुमने कहा था --
"यह कभी मत सोचो कि तुम प्रेम का मार्गदर्शन कर सकते हो,
यदि तुम सुपात्र हो तो प्रेम स्वयं ही तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा..."

और आज भी
मेरा मार्गदर्शन कर रही हैं तुम्हारी प्रेम सम्बन्धी बातें
तुमने उसी जमाने में फिर कहा --
"प्रेम किसी पर आधिपत्य नहीं जमाता
और न ही किसी के आधिपत्य को स्वीकार करता है
प्रेम के लिए प्रेम ही पर्याप्त है..."

और मैंने तोड़ डाले सारे बन्धन आधिपत्यों के
और इतने युगों के बाद वापस आई हूँ धरती पर
तुम्हारे और
सिर्फ तुम्हारे लिए ।

अपने हिसाब से तुमने कभी अपने प्रेम को मेरे पैरों में
बेड़ियों की तरह नहीं पहनाया
तुमने मेरे मन का प्याला प्रेम से इतना भर डाला कि
आज भी तुम्हारे प्रेम के बीज जीवित हैं
मेरे मन में
मेरे शरीर में
मेरे हृदय में आज भी चटक रही हैं तुम्हारे प्रेम की कलियाँ
और इन कलियों की ख़ुशबू से महक रही हैं मेरी साँसें .
आज भी मैं मना रही हूँ ख़ुशियाँ
और
मौसम की अलमस्त बहारों से गुज़रते वक़्त

हमेशा मेरे साथ होते हो तुम
और जब शरद में चुनते हो अंगूर
मदिरा बनाने के लिए
मदिरा बनकर मैं ही भर जाती हूँ अनन्त के पात्रों में संचित होकर
सर्दियों में जब भी निकालते हो उस मदिरा को पीने के लिए
तो हर प्याले के लिए तुम्हारे हृदय में होता है एक गीत
जिसमें विद्यमान होती है
शरद की
अंगूर की
अंगूर के बगीचे की
निचुड़ते हुए रस की और
मेरी मधुर स्मृतियाँ...

आज भी मेरी नज़रों से जब ओझल होते हो तुम
घर से निकल कर काम पर जाने के लिए
तो बन जाते हो वह बाँसुरी
जिसके हृदय से गुज़रती है समय की साँस
हर पल
और बदल जाती है
एक अनहद संगीत में .
ज़िन्दगी को तुम समझते हो प्यार से
और प्यार को श्रम के माध्यम से
ज़िन्दगी को श्रम के माध्यम से प्यार करते हुए ही
जान लेते हो तुम बारीकी से
उसके अन्तरंग रहस्यों को
और
बतला देते हो मुझे भी
प्रेम से प्रेरित कर्म का रहस्य
जहाँ
जब इनसान ख़ुद से ख़ुद को बाँधता है और
एक-दूसरे से बाँधता है तो
वह स्वयं को ईश्वर से बाँधता है ।

तुम बतलाते हो प्रेम से प्रेरित कर्म की परिभाषा :
"यह अपने हृदय से खींचकर काते गए सूत से कपड़ा बुनना है,
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही पहननेवाली हो उसे..."
"यह इतने प्यार से भवन का निर्माण करना है,
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही रहनेवाली हो वहाँ... "
"यह इतनी कोमलता से बीज बोना
और इतने आनन्दित होकर फलों का संचय करना है
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही खानेवाली हो वे फल... "
"यह अपने हाथों किए गए प्रत्येक कर्म को
अपनी दिव्यता की ऊर्जा से भर देना है..."
"और ऐसा महसूस करना है, मानो समस्त निर्जीव सत्ताएँ
तुम्हारे आस-पास खड़ी तुम्हारे कर्मों को निहार रही हैं... "

तुमने बुने मेरे लिए अपने प्रेम के सूत से
पारम्परिक और आधुनिक झीने परिधान
तुमने बनाए मज़दूर बनकर मेरे लिए
ख़ूबसूरत डुप्लेक्स फ़्लैट
तुमने तब लगाई थी जो क़लमें बोनसाई आमों की
वे दे रही है तब से अब तक फल सिर्फ़ मेरे लिए
और तुमने सचमुच भर दी इतनी दिव्य ऊर्जा मेरी रूह में
कि मैं रोक ही नहीं पाई अपने आप को
वापस धरती पर आने से
और सचमुच सभी आधिपत्यों का विरोध कर
मेरा यहाँ आना
निहारती रह गई सारी सजीव और निर्जीव सत्ताएँ


अब जब मैं वापस आई हूँ तुम्हारे लिए
तुमने बदल डाला है पवन के स्वरों को एक गीत में
और
प्रगाढ़ कर डाला है अपने प्रेम से उस गीत की मिठास को
तुमने प्रेम को कर्म के रूप में दृष्टिगोचर बनाकर
वर्षों पहले कही अपनी ही बात की
कर डाली है पुनर्व्याख्या
एक नए तरीके से
तुमने मुझे कर डाला है इस बार
स्थिर, सन्तुलित और अडिग
क्योंकि इस बार मैं होकर आई हूँ ख़ाली
तुमने मुझे कर डाला है
नग्न और निर्बाध
मेरे ही अंगों से
कर डाला है मुक्त
मेरे ही दोहरे व्यक्तित्व से
कर डाला है मौन अपनी ही तरह
जो मेरे दिनों और रातों के रहस्य का ज्ञाता है
तुम छू रहे हो अब भी
मेरे स्वप्नों की नग्न काया
अपनी काँपती, थरथराती उँगलियों से
और आज भी पैदा कर रहे हो मुझमें वही सिहरन
प्रेम का वही रोमांच
जो कभी सदियों पहले पैदा किया था
तुमने जगा दिए हैं मेरी आत्मा के अदृश्य जलस्रोत
जो कल-कल ध्वनि के साथ सदियों से अब तक
मिल रहे हैं तुम्हारे प्यार के समन्दर में
तुम अब भी, अनायास ही शामिल हो जाते हो
मेरे हृदय की छोटी-छोटी ख़ुशियों के ओस-कणों में,
मेरी खिलखिलाहटों में
मेरे आँसुओं में
मेरी वेदना, मेरी पीड़ा में भी
महसूस करती हूँ मैं कि
तुम दुबारा से जी उठे हो मेरे होंठों में
मेरे वर्तमान में
स्मृति-विभोर होकर मैं कर रही हूँ आलिंगन अतीत का
और
प्रेमातुर होकर भविष्य का
एकाकार हो रही हूँ तुम्हारी आत्मा के साथ
तुम्हारी आकाँक्षाओं, तुम्हारी अनुभूतियों और
तुम्हारी अनन्त सत्ता के साथ
हम अभिन्न हैं
आज भी
सरिता और सागर की तरह
है न खलील...
बोलो...?