भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

ओ बिदेसिया ! / रश्मि भारद्वाज

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

1.

ओ बिदेसिया
तुम्हारी गाथा लिखना चाहती थी
लिखना चाहती थी वह दर्द
जो सदियों से झेलते आए हो तुम
लिखना था कि चन्द रोटियों की ख़ातिर
अपनी मिटटी से दूर होकर कैसे जी पाए तुम
लिख देना चाहती थी
वह सारी अवहेलना, वह सारी घृणा
जो तुम्हारी नियति बन गई है

जानती हूँ ख़ून उतर आता होगा तुम्हारी आँखों में भी
सुनकर अश्लील उपाधियाँ और वो हिंसक रिश्ता
'भईया' बनाने का
जिसमे प्रेम नहीं नफ़रत छुपी होती है उनकी
लेकिन तुम्हारे इस असहाय क्रोध को भी चाहिए कुछ आधार
मसलन एक छत जो बचा सके मुसीबतों से
एक भरा हुआ पेट जिसे कल की चिन्ता न हो
और शायद तुम्हारे अपने
जो कहीं दूर बस इसी आस में टकटकी लगाए रहते हैं कि
नुक्कड़ की दुकान से आएगा तुम्हारे फ़ोन का बुलावा

जानती हूँ तुम्हे नींद नहीं आती देशी बोतल या गाँजे के बिना
फिर नहीं आते मालिक के सपने
जो खड़ा होता है छाती पर अपनी उधार की रकम के लिए
बबलू भी याद नहीं आता
कैसे गोल-गोल आँखें मटकाता था
बुधना ने बीड़ी पीना सीख लिया था
यह भी याद नहीं रहता
न ही याद रहती है मंगली की लौकी की बेल-सी चढ़ती उम्र
और उसके हाथ न पीले कर पाने का मलाल
रामपुर वाली की मीठी देह-गंध भी तब नहीं सताती तुम्हे
यह सब कुछ लिखना चाहती हूँ

लेकिन कैसे लिख पाऊँगी तुम्हारी अन्तहीन पीड़ा
मैं भी तो इसी सभ्य समाज का हिस्सा हूँ
जिसकी नज़र में तुम हो जंगली, जाहिल, गँवार
हम भला कैसे जानेंगे तुम्हारा दर्द !
तुम्हारी सैकड़ों वर्षों की वह त्रासद-कथा
जब भेड़-बकरियों से लादे गए थे तुम जहाज़ों पर
काले पानी को पार कर कभी नहीं लौटने के लिए

आज भी ठूँसे जाते हो तुम ट्रेन के डब्बों में
यहाँ तक की छतों पर भी
और कभी-कभी यूँ ही कहीं लावारिस पड़े मिलते हो बेजान
ठेले पर लाद कर भेज दिए जाने के लिए मुर्दा-घर

2.
 
सोचो तो जरा बिदेसिया
तुम पैदा ही क्यों किए गए?
सिर्फ़ हम सफ़ेदपोशों के इस्तेमाल के लिए !
ताकि तुम ढो सको हमारा बोझ अपने कन्धों पर
हमारे भवन, हमारी सड़कें, हमारे कारख़ाने
जहाँ मेहनत बोते हो तुम
और फ़सल काटते हैं हम
और तुम्हे मिलते हैं चन्द सिक्के और ढेर सारी घृणा
तुम्हारे पसीने की गन्ध से उबकाई आती है हमें
भूल जाते हैं कि इस पसीने के दम पर ही है
हमारी दुनिया सुन्दर और आरामदेह
तुम सब माफ़ कर देते हो बिदेसिया

पता है मुझे
ग़ालियाँ खाकर, नफरत झेलकर भी
तुम करोगे हमारा ही सजदा
क्योंकि भारी है तुम्हारी रोटियाँ
किसी भी और भावना पर
कैसे कह दूँ लौट जाओ अपने गाँव
भले ही भूखे मर जाना

लेकिन कचोटती है तुम्हारी पीड़ा
हमवतन जो हो तुम मेरे
अन्तर्मन करता है कई प्रश्न
मैं निरुत्तर हूँ
चाहती हूँ, तुम दो उनका उत्तर
चाहती हूँ, तुम कहो कुछ
बताओ कि तुम भी इंसान हो हमारी तरह
हम ये भूल चुके है
अब तक अपना पसीना बेचा है न तुमने
अब अपने आँसुओं की बोली भी लगाओ
शायद मिल जाएँ कुछ अच्छे ख़रीददार