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क्या सच में ? / रश्मि प्रभा

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प्यार -
एक नशा ...
नशा आँखों का
प्यार की एक झलक का
एक मुस्कान , एक छुवन
एक शब्द , एक इशारे का ..
.
नशा - इंतज़ार का
रुक जाती है -घड़ी की सूई
सौ प्रतिशत रुक जाती है
धड्कनें अजीब सी धड़कती हैं
आँखों की पुतलियाँ चकरी बन जाती हैं
सड़कों पर कुछ नज़र नहीं आता
सिवा उस नशीले इंतज़ार के ....


नशा- उसके होने का
घड़ी की सुइयों की रफ़्तार
बेहिसाब .....
तेज धड्कनें , डगमगाते कदम
कभी हँसी
कभी नमी .... अजीब हालात होते हैं !
.........
फिर सड़क पर भीड़ ही भीड़
दिमाग में सन्नाटा
और अनुभवों की हिदायतें
नशा कोई भी हो - बुरा है
क्या सच में ?