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गंगा / 15 / संजय तिवारी

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राम
बहुत कुछ देखती हूँ
देखती रह जाती हूँ
कई बार सीता की जगह
खुद को पाती हूँ
इसे शिव शक्ति संवाद से
लोक न जोड़े
लोकमर्यादा कोई न तोड़े
मेर भीतर भविष्य का कीड़ा है
अजीब सी पीड़ा है।

मुझे ऐसे ही बहना है
तुम्हारे बाद भी रहना है
त्रेता के बाद
काल के साथ
द्वापर आएगा
तुम्हारे कुल से पायेगा
महाभिषक का नाम
वही मेरा ब्रह्मधाम
मुझे पुनः आना ही होगा
शांतनु को पाना ही होगा
जगत के जीवों को तारूँगी
अपने ही सात पुत्रो को मारूंगी।

मेरी पीड़ा
कैसे जानोंगे
तुम उस इक्ष्वाकु को
कैसे पहचानोंगे
तुम्हारे बहुत बाद यह होना है
मुझे बहुत रोना है
तुम्हें अभी से कितना सुनाऊँ
क्या क्या बताऊँ
इक्ष्वाकुवंश की अधिष्ठात्री हूँ राम
बड़े अनोंखे हैं कुछ आगत नाम
शांतनु की पत्नी बनूँगी
देवब्रत की माता
वसु ड्यूनाम मेरे गर्भ से होकर आएंगे
भीष्म बन कर युगपुरुष कहलायेंगे।

मैंने भी क्या कर दिया
कैसे भविष्य बांच रही हूँ
मेरे सामने राम और
मैं ही राम को जांच रही हूँ
नही
यह नही होगा
राम भूत और भविष्य नही होगा
राम हर निमिष है
हर पल
निर्बल का बल
वही सत्य है
वही आत्म है
वही चेतना है
वही तत्व है
क्षिति
जल
पावक
गगन
समीर
राम ही है
कुछ भी तो इनसे इतर नही
अनजान नही
अनुमान नही
अभिमान नही

नियति की नियति
मेरी भी गति
राम की मति
सृष्टि की प्रति
यह तो विरंचि की माया है
सभी जाएंगे जो भी आया है।