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गावत बाँदर बैठ्यो निकुञ्ज मेँ ताल समेत मैँ आंखिन पेखे / रघुनाथ

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गावत बाँदर बैठ्यो निकुञ्ज मेँ ताल समेत मैँ आंखिन पेखे ।
तेँ जो कह्यो यह सो सुनि कै अपने मन मेँ इन साँच न रेखे ।
यामे न झूठ कछू रघुनाथ है ब्रम्ह सनातन माया के लेखे ।
गाँव में जायके मैँ हूँ बछानि को बैलहिँ वेद पढ़ावत देखे ।
 

रघुनाथ का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।