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चाँद और चराग़ / हुसैन माजिद

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हमें तो ख़ैर
अँधेरों ने डस लिया
लेकिन गए थे तुम तो
ख़लाओं में रोशनी लेने
धुएँ में
लिपटे हुए क्यूँ हो सर से
पैर तलक
मलीह चेहरे पे छाई है
मुर्दनी कैसी
चमकती आँख में
ज़र्दी कहाँ से दर आई
बदन निढाल सा
क्यूँ है
क़दम थकन-आलूदा

सुनो कि चाँद हमेशा
फ़रेब देता है
हँसो हँसो कि बहुत ज़ोर से हँसते थे तुम
नज़र झुकाने से
अब काम चल नहीं सकता हयात करनी ही ठहरी
तो आओ
मेरे साथ
पुरानी बस्ती के पुर-पेच रास्तों पे चलो
जहाँ गढ़े हैं तअफ़्फुन है और वीरानी
हर एक घर के दर ओ बाम से टपकती है
मगर
झारोंकों में जलते चराग़
गर्दूं के
चमकते चाँद की मानिंद पुर-फ़रेब नहीं