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चाहे कितनी भी विराट / विजय सिंह नाहटा

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चाहे कितनी भी विराट
क्यों न हो
ग़र, ये दुनियाँ
इंसानी अंगुलियों में गुथा शिल्प
बंजर धरती को बनाता
हर बार हरा भरा
और;
इस फैले हुए निर्जन द्वीप को
हर क्षण
जीवन से लदापदा; भरा पूरा
औ' आबाद?