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ज्योति / मृत्युंजय कुमार सिंह

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उमड़ता ज्योति का भँवर
तम को पकड़
 
तम, तमस ही शाश्वत
रूप है प्रकृति का
वो धरा हो, व्योम हो
या तल हो
सागरों की तलहटी का
 
किन्तु अँधेरा तिलस्मी
भी खोजता है, एक मुट्ठी रश्मि
जिसके असर से देख पाएँ
हम अपने अंदर की नमी

कहना कठिन है
कौन है इस जगत की जननी -
तमक कर अकड़ा हुआ तम
या फिर ज्योति से पुलकित
एक अगोचर
जीवन का जो भान प्रथम

हम जीवित-से लोग
हर क्षण जो साँस लेते
यह गति तो आ नहीं सकती है तम से
प्राण से वंचित
किसी प्राणी अधम से
 
इसलिए तो कह रहा हूँ
भर दो तम को
रश्मियों से,
ज्योति से खलखल
उमड़ती उर्मियों से
 
देख लेने दो अंधेरों को
तनिक जीवन का रूप,
केवल अँधेरा ही नहीं
हम सब में है
एक मुट्ठी धूप,
उग रही जो हर तरफ
इस जगह या उस जगह
आदमी के धमनियों के
रक्त में बन कर सुबह
  
ज्योति ही जीवन का परिचय
ज्योति में जीता न संशय,
ज्योति ही पूजा का उपक्रम
ज्योति ही प्राणों का संगम।