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दिन तो रौशन थे धुँधलके में समायीं शामें / रवि सिन्हा

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दिन तो रौशन थे धुँधलके में समाईं शामें
सुब्ह आँखों ने बसीरत<ref>अन्तर्दृष्टि ( insight)</ref> ने दिखाईं शामें

कुछ तो दिन भर की मशक़्क़त ने कमाईं शामें
और कुछ आप की यादों ने बिछाईं शामें

तेरी फ़ुरक़त<ref>वियोग (separation (from beloved))</ref> का असर तुझ को बताऐं कैसे
तूने कब ख़ुद से जुदा हो के बिताईं शामें

कम से कम दूर से ही देख ले सूरज उसको
चाँद को बा'ज़ दफ़ा खेंच के लाईं शामें

रात हस्ती<ref>अस्तित्व (existence)</ref> की फ़सीलों<ref> सीमाओं (boundaries)</ref> पे खड़ी होती थी
फिर भी लम्हों के चराग़ों ने सजाईं शामें

शब<ref>रात (night)</ref> के असरार<ref>भेद (secrets)</ref> म'आनी में घुले हैं दिन के
पीर<ref>बुज़ुर्ग (elderly, venerable)</ref> को पैकरे-इबहाम<ref>अस्पष्टता की पोशाक में ( in the form of ambiguity)</ref> में आईं शामें

शब्दार्थ
<references/>