भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

दो-पहर / कैफ़ी आज़मी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर है
ये दौर जो के पुराना नही नया भी नहीं
ये दौर जो सज़ा भी नही जज़ा भी नहीं
ये दौर जिसका बा-जहिर कोइ खुदा भी नहीं

तुम्हारी जीत अहम है ना मेरी हार अहम
के इब्तिदा भी नहीं है ये इन्तेहा भी नहीं
शुरु मारका-ए-जान अभी हुआ भी नहीं
शुरु तो ये हंगाम-ए-फ़ैसला भी नहीं

पयाम ज़ेर-ए-लब अब तक है सूर-ए-इसराफ़ील
सुना किसी ने किसी ने अभी सुना भी नहीं
किया किसी ने किसी ने यकीं किया भी नहीं
उठा जमीं से कोई, कोई उठा भी नहीं

[पयाम = संदेसा ]

कदम कदम पर दिया है रहज़नों ने फ़रेब
के अब निगाह मे तौकीर-ए-रहनुमा भी नहीं
उसे समझते है मंजिल जो रास्ता भी नहीं
वहाँ लगाते हैं डेरा जहाँ वफ़ा भी नही

[रहज़न = चोर ]


ये कारवाँ है तो अनज़ाम-ए-कारवाँ मालूम
के अजनबी भी नहीं कोई आशना भी नहीं
किसी से खुश भी नहीं कोई खफ़ा भी नहीं
किसी का हाल मुड़ कर कोइ पूछता भी नहीं