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नालंदा के प्रति / मृत्युंजय कुमार सिंह

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बहुत करुणा जगी
तुम्हें देख कर बुद्ध,
उस कब्रगाह में
जहाँ
तुम्हारी स्मृतियों का भग्नावशेष
सैलानियों का आकर्षण है

वहाँ के बाग़ में भी मुझे
बहुरूपी खाद्य के पैकेट दिखे
और विभिन्न पेय की खाली बोतलें

दूर बमियान में भी अब
वही सब दिखता है
और हाँ,
कुछ और बीभत्स रूप से
टूटी हैं वहाँ की मूर्तियां
सुनते हैं तराशे गए पत्थरों में
कीलों के बज्र जैसी चुभी
गोलियाँ

नालंदा के काल-खंड में
गोला-बारूद नहीं था न …
इसलिए उसे
घोड़ों और तलवारों से रौंदा
किसी खिलजी ने
पुस्तकालय में आग भी लगाई
सुनते हैं, जो महीनों तक नहीं बुझी
अज्ञान ने ज्ञान की चिता जलाई

फिर कुछ पंडितों ने
भिक्षुओं के सर भी तो कटवाए
अशर्फियों का लालच दे कर
लालच ने
स्वाभिमान को भी पालतू बनाया

एक नया नालंदा विश्वविद्यालय
बन रहा है
समीप ही
वितंडा और कुचक्र के धूल के बीच
उसको भी हम रहे सींच
क्योंकि हमें कुछ और खंडहर चाहिए
कुछ और स्मारक
सैलानी हर दिन बढ़ते जा रहे हैं

जैसे मिट्टी में फूटते ही
जीवन के अंकुर
दब जाते हैं कभी-कभी
परत-दर-परत, बेज़ुबान
सभ्यताओं के
ऐसे ही रहे हैं
कदाचित प्रतिमान

सोच रहा था यही कुछ
सोच रहा था
कि कैसे नए प्रजन्मों को बताऊंगा
यह करुण कथा

कि तभी
शैवालों के बीच दबी
ईटें, समवेत स्वर में कह उठीं –
"मैं ज्ञान हूँ
मैं ध्यान में हूँ..."
अचानक दिखती है
हवा में उठती
धुएं की एक लकीर
जिसमे फंसी, जले हुए ज्ञान की
खुरदरी तलहथियाँ
मेरे गालों को सहलाती
देती हैं चीर

ज्ञान अभी भी सुलग रहा है
पुस्तकालय में नहीं
तो उसकी परिधि में बसे
एक-झुण्ड गावों की
रसोई के चूल्हों में
लेकिन वह सैलानियों के फोटो में
नहीं आता ...
ज्ञान भूत है
कैमरे में नहीं समाता …

टूटे अंगों से भी ध्यानस्थ
नालंदा के बुद्ध
बमियान के, उतने ही टूटे
बुद्ध की प्रतिमाओं से कहते हैं-
"यहाँ से वहाँ तक
सभ्यता की एक ही निशानी है भंते! …
तृष्णा, ईर्ष्या, हिंसा
अराजक प्रकृति की अविराम मनमानी है भंते!"....

मेरे पदचाप के नीचे
फिर से कोई फुसफुसाता है –
"बुद्धम शरणं गच्छामि
धम्मम शरणं गच्छामि..."
किन्तु
इस बार किसी ने नहीं कहा –
"संघम शरणं गच्छामि!"