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पटनियाँ टट्टूक प्रति / राजकमल चौधरी

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हम आयल छी कमतौलसँ
पढ़ै-ले कौलेजमे!
होस्टलमे सामान धय
पेंट चढ़ाय आ कोट पहिरि
राति-दिन दुपहरि
घुमै छी हम मौजमे
पढ़ै-ले कौलेजमे!

वाह रे वाह, पटना कौलेज
दड़िभंगा महाराजक सन
ठक्क भ’ रहलहुँ देखितहिँ
चारू दिस देखि भेलहुँ मोहित
सभ वस्तु अपूर्व आ...हा...
लगमे चाहक कैंटीन
ठाढ़ एम्हर-ओम्हर छात्र-वर्ग
एक-दू-तीन, अनगीन
इह, छौड़ो सभ अछि
क’ रहल अछि चुरचुर-मुरमुर
गप्प-सप्प, हँसी ठट्ठा, घुमसुर
रड़घुम्मस
बाप रे बाप, अनर्थ भ’ गेल
हमरे दिस ताकि-ताकि
कहि रहल अछि ‘‘देहाती है, दड़भंगिया है, भुच्च है!’’
नहि बाबा
हम नहि छी दड़भंगिया
हम त’ छी पटनियाँ टट्टू
हम त’ छी पूर्ण निखट्टू
हँ, नव छी
सीखैत-सीखैत चालि धरब
चाबुक खायब, नाल ठोकायब
चालि धरब
अच्छा...
की कहलहुँ अपने?
अयँ? की? फेर स’ कहू त’?
हँ, बुझलहुँ, उचित कहैत छी
सभ दड़भंगिया
होइत अछि जन्मेसँ रसोइया
करैत अछि भानस, पोसैत अछि पेट
कमाबैत अछि तोड़ाक-तोड़ा रुपैया
किन्तु; मित्र!
सुनैत छी
भ’ रहल अछि हल्ला-गुल्ला
मैथिल सभ मङैत अछि प्रान्त
कृष्णक गोपिकामय शासनकेँ
गरिअबैत अछि खुल्लमखुल्ला
मोकामामे पूल बनैत अछि
कुटिल काँट सभ फूल बनैत अछि
दामोदरक अरण्यघटिका
स्वर्गक समतूल बनैत अछि
आओर एम्हर
कनैत अछि मिथिला
मिथिला अछि पुत्र-विहीना
मिथिला अछि शिथिला
कौशिकीक प्रकोप अछि
मलेरियाक प्रहार अछि
जन-जनके घरमे
मरणक महा हाहाकार अछि
किन्तु, तेँ की? सुनै कै?
मैथिल अछि बुड़िबक
मैथिल अछि मूढ़
तेँ लपेटने छैक
हाथीक सूँढ़

आब कहैत छी
अहाँ अतीतक गप्प
की अहाँकेँ नहि अछि मोन?
अहाँ नहि सुनने छी विद्यापतिक नाम?
नहि सुनल अछि मधुर गीत
ओ स्वर्गिक माधुर्य, तान?
ओ काव्यक चमत्कार
गोपिकाक शृंगार
राधिकाक मनुहार
ओ उपालम्भ, ओ अभिसार
कृष्णक केलि, मान, विहार
नहि सुनलहुँ?
सीताक जीवनक तप-ताप अभिशाप
सतीत्वक विमल प्रताप?
अहाँ नहि पढ़लहुँ?
हमर उपनिषद्
याज्ञवल्क्यक तर्क
गार्गीक ज्ञान
जनकक अनासक्ति
वशिष्ठक भक्ति
परशुरामक स्वाभिमान?
भारती-मंडन द्वारा शंकरक मान-मर्दन?
तखन अहाँ की जानब
मिथिला की थिक
थिक की मैथिल परम्परा
हे औ, पटनियाँ टट्टू
हे औ, निखट्टू
की धँसल हमर शब्द करेजमे
पढ़ै-ले कौलेजमे!

-वैदेही: फरवरी, 1955