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बहरापन-3 / ऋषभ देव शर्मा

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दीवारों ने सुन ली,
तारों ने भी सुन ली,
केवल तुमने नहीं सुनी
मेरे मन की बात;
आख़िर
तुम ठहरे
           जन्मों के बहरे !