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बाएँ से उड़के दाईं दिशा को गरुड़ गया / दुष्यंत कुमार

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बाएँ से उड़के दाईं दिशा को गरुड़ गया

कैसा शगुन हुआ है कि बरगद उखड़ गया


इन खँडहरों में होंगी तेरी सिसकियाँ ज़रूर

इन खँडहरों की ओर सफ़र आप मुड़ गया


बच्चे छलाँग मार के आगे निकल गये

रेले में फँस के बाप बिचारा बिछुड़ गया


दुख को बहुत सहेज के रखना पड़ा हमें

सुख तो किसी कपूर की टिकिया-सा उड़ गया


लेकर उमंग संग चले थे हँसी—खुशी

पहुँचे नदी के घाट तो मेला उजड़ गया


जिन आँसुओं का सीधा तअल्लुक़ था पेट से

उन आँसुओं के साथ तेरा नाम जुड़ गया.


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अफ़वाह है या सच है ये कोई नही बोला

मैंने भी सुना है अब जाएगा तेरा डोला


इन राहों के पत्थर भी मानूस थे पाँवों से

पर मैंने पुकारा तो कोई भी नहीं बोला


लगता है ख़ुदाई में कुछ तेरा दख़ल भी है

इस बार फ़िज़ाओं ने वो रंग नहीं घोला


आख़िर तो अँधेरे की जागीर नहीं हूँ मैं

इस राख में पिन्हा है अब भी वही शोला


सोचा कि तू सोचेगी ,तूने किसी शायर की

दस्तक तो सुनी थी पर दरवाज़ा नहीं खोला.