भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बाथरूम परछाई / अवतार एनगिल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

स्नान गृह के फर्श पर
पानी की तैल धार
गिर
टूट
छिटक
फैल
बिखर: रुक गई है
और चमक उठा है
फर्श दर्पण
डल्ल झील-सा
कपड़े उतारती हूं
सभ्यता
रंग
प्रसाधन
कसाव : टांग कर हैंगरों में
रखकर स्थानों पर
कश्मीरी---छिक्कू केश खोल
उतार---व्यक्तित्व का भार
देखती हूं फर्श पर
फर्श में
नीचे कहीं से
देखती है और कोई मेरी तरफ : मैं ।

नहीं, नहीं
और है यह कोई
फूहड़----सी
काली----सी।
पीली-थुलथुल
चिर-बीमार
खुले बालों की
वेस्ट पेपर बास्केट से
झांकती है मेरी तरफ

यह फर्श की डल्ल-झील
जिसके नीचे मिट्टी
कीचड़
गारा
अंधियारा
चिपचिपाहट
कुलबुलाहट

और जिसके ऊपर
उतरूं मैं
रूप, रंग, राशि ले
कमल बन

झील के ऊपर
आसमान का दर्पण
झील के गिर्द
पर्वतों के झुण्ड
खड़े हैं स्तुति में

पर यह फर्शी अक्स
टूटकर
चुभ जाता है

मेरे पंखों के पैराशूटों में
शीशे का हर टुकड़ा
बन जाता है एक दर्पण
डल्ल झील
मुंह चिढ़ाता है यह दर्पण
छीन लेता है मेरा गुलाल
पानी की तैल धार
ग़िर,टूट, फैल,चिटक,बिखर,रुक
चमका देती है
फर्श दर्पण
डल्ल झील

कैसे कहूं कि
और है यह कोई
फूहड़-सी
काली-सी
पीली-थुलथुल
चिर-बीमार
खुले बालों की वेस्ट पेपर बास्केट से
झांकती है मेरी तरफ।