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मन / शशांक मिश्रा 'सफ़ीर'

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हाँ,
एक मन था।
जो उड़ जाता था,
आंगन में फुदकती गौरैयों के साथ।
जो मारकर ढेलों पर ठोकर,
दौड़ जाता था खड़ंजे पर नंगे पाँव।
एक मन था।
जो उछल पड़ता था,
देखकर मेरी नन्ही हथेलियों में रसगुल्ले।
एक मन था,
जिसकी दुनियाँ नाप ली थी
मेरे नन्हे कदमों ने।

अब एक मन है।
जिसकी दुनियाँ छोटी नहीं।
ये जो मन है,
जैसे कुरुक्षेत्र हो।
ना जाने किस कृष्ण की
प्रतीक्षा में है।