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मानवता की आस में / कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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मानवता भी मानवीयता छोड़
अमानवीयता पर उतरी तो
मानव मन हुआ
चिंतित, परेशान।
व्याकुल होकर पूछा-आखिर क्यों?
मानवीयता ने
नासमझ मन को समझाया,
जो दिख रही है अमानवीयता
कल तक थी मानवीयता,
सत्य है।
यह काल का चक्र है,
घूमता है सभी के ऊपर से।
कल घूम रहा था
मानवीयता पर
तो
आज घूम रहा है
अमानवीयता पर।
पड़ाव हैं ये सभी
कालचक्र के,
रुक कर एक क्षण
फिर बढ़ता है आगे को।
पर निराश न हो मानव मन,
तू क्यों चिन्ता करता है?
यह चक्र आगे भी घूमेगा,
कभी यह मानवीयता पर
फिर रुकेगा।
तब तू फिर से
मानवीयता की छांव में पलेगा।
शंकित मानवीय मन
न माना,
शंका को दोहराया-आखिर कब?
अब नहीं था
कोई जवाब इसका,
थी अमानवीयता को ओढ़ती
मानवीयता भी निरुत्तर
और मानवीय मन
खड़ा था
अमानवीयता की धूप में,
कभी आने वाली
मानवता की छाँव की आस में।