भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी / रेखा चमोली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुम चाहते हो
मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र
तुम जब चाहे तब
डाल जाओ उसमें
कूड़ा-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो
अपने
कथित-अकथित पाप
जहाँ चाहे बना बाँध
रोक लो
मेरे प्रवाह को
पर मैं
कभी गंगा नहीं बनूँगी
मैं बहती रहूँगी
किसी अनाम नदी की तरह
नहीं करने दूँगी तुम्हें
अपने जीवन में
अनावश्यक हस्तक्षेप
तुम्हारे कथित-अकथित पापों की
नहीं बनूँगी भागीदार
नहीं बनाने दूँगी तुम्हें बाँध
अपनी धाराप्रवाह हँसी पर
मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी
चाहे कोई मुझे कभी न पूजे।