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यह मेरा अपराधी मन / ऋषभ देव शर्मा

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पल प्रतिपल शंकित रहता है, यह मेरा अपराधी मन
कितने कशाघात सहता है, यह मेरा अपराधी मन
 
एक रात जब नभ से बरसी, थी अमरित की धारा
रूप स्नान कर पूर्व दिशा से, निकली काँवरी तारा
धूलि धूसरित कण-कण तृण ने, किरण चुमनी चाही
छुईमुई के घूँघट पट पर, पापी हाथ पसारा
 
अपनी ज्वाला में दहता है, यह मेरा अपराधी मन
पल प्रतिपल शंकित रेहता है, यह मेरा अपराधी मन
 
एक रात सागर में सहसा, जब वह ज्वार उठा था
शंख सीपियों बस्ती में, मोती एक लूटा था
हाय, अकिंचन इन प्राणों की, उन्मादिन भावुकता
भुवनमोहिनी के पल्लू पर, अपना नाम लिख था
 
बंदी एकाकी गहता है, यह मेरा अपराधी मन
पल प्रतिपल शंकित रहता है, यह मेरा अपराधी मन