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रोटी का प्रश्न / रंजन कुमार झा

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रोटी का ही प्रश्न हाशिये पर रहता हर हाल में
हमने खुद को फाँस लिया है धर्म-जाति के जाल में

देश हुआ आजाद तो ऐसा लगा कि दिन अब बहुरेंगे
निर्धनता-पीड़ित मानवता, दिवस न ज्यादा ठहरेंगे
टूट गए सारे ही सपने राजनीति की चाल में

आगे चलकर लोकतंत्र की पावन-पुण्य तिथि आई
धूम-धाम से हमने छब्बीस तारीख की महिमा गायी
उस छब्बीस से अबतक भी क्या मिला साल-दर-साल में

दिनकर जी के वंशज अब भी दूध वसन चिल्लाते हैं
जिन्हें व्योम से स्वर्ग लूटना था वे नजर न आते हैं
सारे नेता छल-विक्रेता, सब कुछ काला दाल में

पोंगा पंडित-मुल्लाओं का सजा हुआ बाजार है
नटगुरु के हाथों में गिरवी देश बना लाचार है
चूस रहे कुछ जोंक वतन को खादी की ही खाल में
  
निर्मल-आसाराम सरीखे बाबाओं के दौर में
माँगो जो रोटी तो गोली मिलती है मंदसौर में
जो थे ढोंगी बन गए योगी, मुल्क काल के गाल में

भठियारों का सत्ता पर अब पूरी तरह नियंत्रण है
हक की बातें देशद्रोह की धारा का आमंत्रण है
संसद ही तब्दील हुआ जब गैया के गोहाल में