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लोग यूँ हिरासाँ हैं क़ातिलों की बस्ती में / सुरेश चन्द्र शौक़

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लोग यूँ हिरासाँ<ref>भयभीत </ref> हैं क़ातिलों की बस्ती में

काँच के हों बुत जैसे पत्थरों की बस्ती में


वक़्त के ख़ुदा—वन्दो रौशनी के मीनारो!

दुश्मनी न फैलाओ दोस्तों की बस्ती में


कल उन्हें भी आख़िर ये फ़स्ल काटनी होगी

अश्क़ बो रहे हैं जो क़हक़हों की बस्ती में


शहर फूँकने वालो! यह ख़याल भी रखना

दोस्तों के घर भी हैं दुश्मनों की बस्ती में


जज़्बा—ए—महब्बत को खा गई नज़र किसकी

छा गया अँधेरा क्यों क़ुमक़ुमों<ref>बिजली का बल्ब</ref> की बस्ती में


नौहा—खाँ<ref>शोकाकुल</ref> हैं मुटियारें, अश्क़बार<ref>आँसू बहा रहे </ref> हैं गबरू

कैसा शोरे—मातम है घुँघरुओं की बस्ती में


जी में अक्सर आता है तज के मोह माया को

दूर जा के बस जायें जोगियों की बस्ती में


शाम के धुँधलके में कौन याद आया है

इक अजीब हलचल है धड़कनों की बस्ती में


‘शौक़’! अब पहन लो तुम पैरहन<ref>वस्त्र</ref> शराफ़त का

एह्तियात<ref>सावधानी</ref> लाज़िम है ज़ाहिदों<ref>जीतेन्द्रीय लोगों</ref> की बस्ती में

शब्दार्थ
<references/>