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विरह की कविता / माधवी शर्मा गुलेरी

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स्लेट की मेहराब वाला
लकड़ी का घर
हो गया है अब
मकान आलीशान
सुविधाओं से संपन्न
पर
सुक़ून से कोसों परे ।

ज़र्द हो गया है बरगद
आग़ोश में जिसके
गुज़रा बचपन
जवानी और
जेठ की कई दोपहरें ।

तोड़ दिया है दम
गुच्छेदार फूलों से
लदे अमलतास ने
सुनहली चादर से
ढक लेता था जो आँगन
कभी-कभी
मेरे अँधेरों को भी ।

उदास रहती है
ब्यास नदी
अक्सर
बिना कश्ती के
लाँघ लिया है उसे
किसी पुरपेच पुल ने ।

मेरा घर, मेरा गाँव
मेरा नहीं रहा
मैं भी अब
मैं कहाँ रही !