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वैलेण्टाइन डे पर दस प्रेम कविताएँ / विनोद विट्ठल

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1 तरीक़े
 
(1970 में जन्मी एक लड़की के लिए)

मैंने भाषा के सबसे सुन्दर शब्द तुम्हारे लिए बचा कर रखे
मनचीते सपनों से बचने को रतजगे किए
बसन्त के लिए मौसम में हेर-फ़ेर की
चान्द को देखना मुल्तवी किया
सुबह की सैर बन्द की
अपने अस्तित्त्व को समेट
प्रतीक्षा के पानी से धरती को धो
तलुओं तक के निशान से बचाया
न सूँघकर ख़ुशबू को
न देखकर दृश्यों को बचाया
जैसे न बोलकर सन्नाटे को
एकान्त को किसी से न मिलकर
समय तक को अनसुना किया
सब-कुछ बचाने के लिए
याद और प्रतीक्षा के यही तरीक़े आते हैं मुझे !
 
2 जवाब

हाथों की तरह एक थे
आँखों की तरह देखते थे एक दृश्य
बजते थे बर्तनों की तरह
रिबन और बालों की तरह गुँथे रहते थे
साथ खेलना चाहते थे दो कँचों की तरह
टँके रहना चाहते थे जैसे बटन
टूटे तारे की तरह मरना चाहते थे
गुमशुदा की तरह अमर रहना चाहते थे
किसी और नक्षत्र के वासी थे दरअसल
पृथ्वी से दीखते हुए।

3 प्रौढ़ावस्था में प्रेम
 
 एक

उतर चुका होता है देह का नमक
तानपुरे की तरह बैकग्राउण्ड में बजता है बसन्त
गुज़िश्ता तज़ुर्बों के पार झिलमिलाता है दूज का चान्द
टूटे हुए पाँव के लिग़ामेण्ट्स के बाद भी चढ़ी जाती है सँकोच की घाटी
नगाड़े या ढोल नहीं बजते
बस, सन्तूर की तरह हिलते हैं कुछ तार मद्धम-मद्धम
इतने मद्धम कि नहीं सुन पाता दाम्पत्य का दरोग़ा
इतना कुहासेदार की बच्चे तक न देख पाएँ
एक बीज को पूरा पेड़ बनाना है बिना दुनिया के देखे
दरअसल ये उलटे बरगद की तरह पनपते हैं धरती के भीतर
धरती की रसोई में रखी कोयला, तेल और तमाम धातुएँ
इन्हीं के प्रेम के जीवाश्म हैं
जिन्हें भूगर्भशास्त्री नहीं समझ पाते !

दो

बिना बीज का नीम्बू
बिना मन्त्र की प्रार्थना
बिना पानी की नदी
मल्लाह के इन्तज़ार में खड़ी एक नाव है ।

तीन

छीजत है चाँद की
बारिश है बेमौसम
पीले गुलाब की हरी ख़ुशबू है
सफ़ेदी में पुती ।

4 एक स्त्री के अनुपस्थित होने का दर्द

वे जो दर्जा सात से ही होने लगी थी सयानी
समझने लगी थी लड़कों से अलग बैठने का रहस्य
कॉलेज तक आते सपनों में आने लग गए थे राजकुमार
चिट्ठी का जवाब देने का सँकोचभरा शर्मीला साहस आ गया था
बालों, रंगों के चयन पर नहीं रहा था एकाधिकार
उन्हीं दिनों देखी थी कई चीज़ें, जगहें
शहर के गोपनीय और सुन्दर होने के तथ्य पर
पहली बार लेकिन गहरा विश्वास हुआ था
वे गंगा की पवित्रता के साथ कावेरी के वेग-सी
कई-कई धमनियों में बहती
हर रात वे किसी के स्वप्न में होती
हर दिन किसी स्वप्न की तरह उन्हें लगता
वे आज भी हैं अपने बच्चों, पति, घर, नौकरी के साथ
मुमकिन है वैसी ही हों
और यह भी
कि उन्हें भी एक स्त्री के अनुपस्थित होने का दर्द मेरी तरह सताता हो

5 जब वह आ जाती है

डाक की ग़लती से आ जाए कोई प्रेम-पत्र
सुख के मनीऑर्डर पर भगवान हमारा पता लिख दे
एकाध मौसम की चोरी के कारण बसन्त को एकाएक आना पड़े
रविवार और दिनों से दुगुना बड़ा हो
हमारे जागने से पहले मुर्ग़े और सूरज भी सुस्ताते रहें
हम चाबी भरना भूलें और सारी घड़ियाँ बन्द हो जाएँ
आप विश्वास करें वह क्षण आता है
एक बार हमारे जीवन में -- शताब्दी के पहले दिन की तरह
लम्बे इन्तज़ार के बाद ही सही;
जब वह आ जाती है
 
6 प्रेमी

एक

प्रेमिका से
पहली मुलाक़ात का दिन-समय-स्थान पूछ
प्रेमियों को उलझन में न डालो
उनके पास केवल यादें हैं
वे सूखी नदी के मल्लाह हैं
याद दिलाने से रो पड़ेंगे
लोग कहेंगे; नदी का पानी चढ़ रहा है

दो

प्यार
हमेशा अच्छे मौसमों में होता है
चाहे कहीं भी हो, किसी भी मौसम में
आप जानते हैं ;
मरने के बाद प्रेमी मौसमों में बदल जाते हैं

तीन

मर चुके होंगे सारे सफ़ेद कबूतर
युद्ध भी ख़त्म हो चुका होगा आख़िरी बम से आख़िरी आदमी को मार
बचे रहेंगे ये
सूखी घास के गुच्छे और दो पत्थरों के साथ

चार

उनकी दुनिया नहीं बदलती
उन्होंने
प्रेम-पत्र पर धरती को पेपरवेट की तरह रख रखा है

पाँच

उन दिनों लेटर बॉक्स पेड़ों में होते थे
हारिल, कबूतर डाक बाँटते
दूर की होती तो नदी ले जाती दरिया के डाकघर तक
उन दिनों चान्द हमेशा और पूरा चमकता
हवा हमेशा ख़ुशबुदार होती
मौसम का रिकॉर्ड बसन्त पर अटका रहता
फूल अपनेआप गुलदस्ते या वेणी बन जाते
उन दिनों के ये बातें
हर दिनों के प्रेमी सुनाते हैं
जसराज को नए राग
और यती कासरगोड को नए रंग मिलते हैं

छह

हम
कच्छ्पों की पीठ पर बैठ नदी पर करते
पहाड़ पार
ब्रह्मा से आँख बचा
अपने पँख यान-से करते कपोत करवा देते
धरती प्रकृति से आँख बचा दूरी कम करने
थोड़ी-सी सिकुड़ जाती
प्रेमियों की ये बातें सच थोड़ी ही हैं, बुदबुदाते हैं
फिर भी वैज्ञानिक उदास हो जाते हैं

सात

सुना है
मशीनें आ गई हैं
देख लेती हैं धरती के भीतर; ठेठ भीतर
धरती की रसोईं में रखी घासलेट की बोतल
कनस्तर का आटा तक
लगाएँ वह मशीन प्रेमियों के
कि सरस्वती उनके किस हिस्से में बह रही है

आठ

लोग चकित थे
हर तीसरे दिन जंगल में आते बसन्त को देख
पेड़ों का अचानक गहराता हरापन
अमराई में कैरियों का असमय पके आमों में बदलना
घास के दीवान पर नई-नई चादरें होना
बहुत बाद में पता चला
प्रेम-पत्रों को पढ़ने के लिए डाकिया
क़रीने-से लिफ़ाफ़े खोल देता था

नौ

समय को मुर्ग़ा बना देता
चान्दनी तेज़ या मद्धम कर देता
शाम की लम्बाई घटा-बढ़ा देता
मौसम का टाइम-टेबल बदल देता
वह क्या था जो अब नहीं है
सांसारिक के पूछने पर नारद बोले :
उन दिनों तुम प्रेमी थे

7 उत्तर प्रेम

खींचता था घर की तरह
बचपन की तरह जिसमें लौटा नहीं जा सकता
गोपनीय क्षणों की उजास भरी ख़ुशबुदार सुरंग थी वह
बहुत घना एकान्त था दो झींगुरों के बाद भी
बाद के दिनों में मैंने उस सुरंग को नमक में बदला
उधर स्वाद बढ़ा

8 अन्ततः

लम्बी बीमारी के बाद दिखे परिचित की तरह
किसी दिन अचानक दिखेगा वह दिन
जब महसूस होगा कि मुश्किल हो गया है
सिनेमा देखना
सड़कों पर चलना
नया नाम रखना
पत्नी को हँसा पाना
अण्ट-शण्ट खा पाना
बच्चे को समझा पाना
किसी के बारे में सोच पाना
किसी का इन्तज़ार कर पाना
या किसी अपरिचित को दोस्त ही बना पाना
हम बरसों से सुनते आए
किसी राक्षस को पहली बार देखेंगे
सोचेंगे आग लगने पर कुआँ खोदने वाली कहावत
और देखेंगे सभ्यता को भारी मन से जलते
सोचेंगे, काश ! ये किसी फ़िल्म का दृश्य हो
और लाइट चली जाए
या प्रोजेक्टर ही जल जाए
यकायक जैसे हम हो जाते हैं बड़े
बूढ़े इतने कि लगने लगें
फूट जाता है अंडा या फटता है बादल
मर जाते हैं कम उम्र के अच्छे लोग
किसी वाइरस की तरह प्रवेश करती है कोई लड़की
हमें लगेगा कई-कई चीज़ें मुश्किल हो गई है, यकायक
आधे लोग उदास हो जाएँगे
आधे दुःख भरे गीत गाएँगे
आधे दर्शन की ओर भागेंगे
आधे गणित सिरे-से समझेंगे
आधे कम्प्यूटर की ओर देखेंगे
आधे अन्तरिक्ष में जाना चाहेंगे
कुछ खींचेंगे तस्वीरें
कुछ रिकॉर्ड करेंगे बातें
कुछ लिखेंगे आत्मकथाएँ और इतिहास-पुरातत्व की किताबें
कुछ बेपतेदार चिट्ठियाँ
एक वही होगा
जो महसूस करेगा संकट का सूत्र
और प्यार करेगा !

9 इसी तरह

उन दिनों
बड़े और असामान्य समझे जाने वाले घटनाक्रम नहीं होते
बस यूँ ही आदमी का विश्वास थोड़ा-सा सरक जाता है
धरती नमक और पानी के बाद भी खो देती है अपना स्वाद
मौसम सरकारी कर्मचारियों की तरह नदारद पाए जाते हैं सीट से
भीड़ और हथियार भी नहीं मिटा पाते हैं आदमी का अकेलापन और डर
वे होते हैं सभ्यता के सबसे भारी दिन
जब दिन कम हवा की पुरानी साइकल की तरह
थका देते हैं सवार को
रास्ता अपनी लम्बाई के हार्मोन कहीं से चुरा ले आता है
सचमुच वे दिन इतने भारी होते हैं
कि लगता है शेषनाग थक जाएगा
कि अब थका, अब थका
तभी अचानक
एक बच्चा ज़ोर से हँसता है
एक लड़की अपना थोड़ा-सा हिस्सा
हमेशा के लिए किसी को दे देती है
एक पुराना प्रेमी समय की सन्दूक से निकालता है कुछ क्षण
और उन्हें अकेले कमरे में पहनता है
कोई कविता लिखता है
इस तरह धरती अपनी जगह शान्त हो जाती है
टँक जाती है चान्द की तरह भारविहीन हो
हमेशा हार जाते हैं वे दिन
इन दिनों से
इसी तरह ।

10 एक मित्र की प्रेमिका के लिए

काम में लेने के तरीक़े से बेख़बर होकर भी
आग, पत्थर, लोहे और लकड़ी-सी तुम थी
पहिए-सी तुम तब भी लुढ़क सकती थी
फ़र्क़ प्रेम-पत्र की शक्ल में धरती का घूर्णन था दिन-रात लानेवाला
वरना दिन-रात तो थे ही
माना उन दिनों नहीं था विज्ञान
आदमी ने परिन्दों के पर नहीं चुराए थे
मछलियों के जाली पँख भी नहीं बना पाया था
मित्र के मना करने के बावजूद बताता हूँ
नदी के पास तुम्हारी मुस्कुराती फ़ोटो है
हवाओं ने तुम्हारी आवाज़ को टेप कर रखा है
क्या फ़र्क़ पड़ता है सम्बोधनों का इस समय में
जबकि मैं आश्वस्त हूँ
प्रेम, भूख और नींद के बारे में
वास्कोडीगामा से बड़े हैं चन्दामामा
दिन-ब-दिन छोटी और एक-सी होती इस दुनिया में
मुश्किल होगा मेरे मित्र की गरम साँसों से बचना
तपे चूल्हे के पास बेली पड़ी रोटी की तरह ।