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शायद गुलाबों का एक गुच्छा / प्रकाश मनु

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यह शायद गुलाबों का गुच्छा ही है न,
जिसे रेलगाड़ी से निकाले सिर
दूर तलक बढ़ाकर हाथ
दे रहा है एक प्रेमल युवक
प्लेटफार्म पर खड़ी लम्बी, खूबसूरत युवती को।

हां, शायद गुलाबों का गुच्छा ही है
जो युवक के हाथों से अब इकदम छूटने को है
(इसलिए कि चल पड़ी है रेलगाड़ी।)
और युवती के हाथ पूरी तरह उस तक नहीं पहुंचे।
तो क्या नीचे प्लेटफार्म पर ही गिर जाएगा गुच्छा फूलों का ?
फूल जो कि प्यार हैं
फूल जो कि हैं सुंदरता मन की...।
नहीं-नहीं-नहीं...
यह कल्पना ही मुझे थरथरा देने के लिए काफी है।

वह खूबसूरत, लम्बी छरहरी युवती पहने काला हैट
ढकी है ऊपर से नीचे तक लम्बे काले कोट में
जिसने उसकी गोराई को किसी कदर बढ़ा दिया है
और माथे पर झूलती बालों की लटें...
देह की लोच...
वह सब कैसे कहूं ?
पर हां, इस कदर प्रेम की समर्पण मुद्रा में है काले हैट वाली वह औरत
कि अचरज।...अचरज पर अचरज होता है
आखिर यह इसकी लगती कौन है?

क्या केवल सद्यः परिचिता ही है जो रेल के ड़िब्बे में मिली
और जैसा कि सहयात्रियों में होता है अक्सर
धीरे-धीरे बढ़ा परिचय... आ निकला मित्रता की दहलीज पर...
या फिर यह इसकी नव परिणीता है
या प्रेयसि...प्यार के भार या समर्पण की नमी
से झुकी-झुकी?

सवाल और भी हो सकते है ओर इनसे भी बेढब
मगर पता नहीं कौन है जो बता जाता है कान में-
बड़े अचूक ढेग से
कि नहीं, यह काले हैट वाली गौरांगी तो केवल उसकी सहयात्री ही हो सकती है
जो इत्तफाक से मिली रेलगाड़ी के डिब्बे में-
और अब उतरकर गाड़ी से
एक अलग मोड़ पर आ खड़ी हुई है
इस विशाल प्लेटफार्म पर लगभग अकेली।

कुछ भी हो, मगर उसकी यह कशिश
बार-बार हैरान-परेशान सी करती है
और यह सवाल भी कहीं न कहीं उठता है मन में
कि क्या हुआ होगा कवि, इस अपूर्व नाटकीय क्षण से ठीक पहले ?
क्या वे धीरे-धीरे सकुचाते हुए, बातें करते
आए होंगे पास...कुछ और पास ?

और फिर अचानक भीतरी वाष्प से होकर विकल
खोलने लगे होंगे अपने-अपने अकेलेपन का उजाड़
और फिर यह सिलसिला पहुंचा यहां तक कि
गुलाब के फूलों का गुच्छा
उपहार के रूप में दिया गया निकालकर सिर और धड़ तक देह
चलती ट्रेन से ?

क्या हुआ होगा इसके बाद...
मैं सचमुच नहीं जानता।