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हवा में कीलें-7 / श्याम बिहारी श्यामल

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बहुत उद्विग्न हूँ मैं
लौटकर फ़ैजाबाद से
अलीगढ़ से
हैदराबाद से
भागलपुर और अयोध्या से

बर्फ़ हो रहा है
मेरी रगों में
मेरा ख़ून
तमाम देखी हुई हक़ीक़तें--
--ख़ून सनी माटी
कटे हाथ
छँटे पाँव
पेट में घुसा हुआ खंजर
जले हुए मकान
झुलसकर औंधियाए बच्चे
बहुत बेरहमी से रौंदकर
मौत के घाट उतारी-सुलाई हुई बहनें
--मुझे धिक्कार रही हैं
मुझे ललकार रही हैं
मुझे आगाह कर रही हैं

मैं हतप्रभ हूँ
शर्मिंदा हूँ
मैं क्यों था मरा-मरा
अभी तक
क्यों मैं बुनता रहा
शब्दों की सलाइयों पर
बेवज़ह स्वेटर

मैं लड़ूँगा
अपने चोंख शब्दों को लेकर
अजेय हथियार बनाकर

खोलता हूँ ताले
तहखाने शब्द-भंडारों के
अरे, यह क्या!
 
कुचले हुए हैं मेरे तमाम शब्द
रग-रग टूटी है
इनकी भी
घायल शब्दों से लिपटकर
बिलख रहा हूँ मैं
मेरी आँखें देख रही हैं
संतप्त शब्दों की आँखों में
टूटना-बिखरना
गर्भ में पल रही
एक समूची लड़ाई का

मुझ पर आपादमस्तक
रेंग रहा है
गदराए खेतों पर
ओले पड़ने का-सा दुःख